श्लोक 14 / 72 · सांख्य योग

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥

mātrā-sparśhās tu kaunteya śhītoṣhṇa-sukha-duḥkha-dāḥ | āgamāpāyino ’nityās tāns-titikṣhasva bhārata

सरल हिंदी अर्थ

हे कुंतीपुत्र! सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख की अनुभूतियां अनित्य हैं, वे आती और जाती रहती हैं। इसलिए हे भारत! उन्हें समभाव से सहन करो।

आज के जीवन के लिए व्यावहारिक सीख

जीवन में कोई भी कठिन या सुखद परिस्थिति स्थायी नहीं होती।
मुश्किल दिनों में धैर्य बनाए रखें और सफलता मिलने पर अहंकार से बचें।
सुख और दुःख दोनों में अपने मन का संतुलन कभी मत खोइए।
स्थिर और शांत मन ही आपकी सबसे बड़ी आंतरिक ताकत है।